पूजा उपाध्याय
दिल के भीतर चाहे जैसे भी रंग भरे हों, दिल की आउट्लाइन दुःख के सीले स्याह से ही बनायी गयी है। जाने कैसी उदासी है जो रिस-रिस के आंख भर आती है। कुछ दिन पहले पापा से बात कर रही थी, उन चीज़ों के बारे में जिनका नाम सिर्फ़ उन्हें पता है। कई सारे खिलौने। अभी जब सब कुछ ही प्लास्टिक का होता है और छूने में एक ही जैसा लगता है। तब के इस खिलौने में कितनी चीज़ों का इस्तेमाल था। सन की रस्सी। गांव के रास्ते कई जगह देखती थी सन को धूप में सुखाया जा रहा होता था और फिर उसकी बट के रस्सी बनायी जाती थी। रस्सी से खींची जाने वाली आवाज़ करने वाली एक गाड़ी होती थी। इसी तरह हाथ में पकड़ कर गोल-गोल घुमाने वाला एक खिलौना होता था। उसमें गहरे गुलाबी रंग की प्लास्टिक की पन्नी लगी होती थी। जिसे हम रानी कलर कहते थे। गांव में एक बड़ी-सी अलमारी थी। उसमें जाने क्या-क्या रखा रहता था। धान रखने के लिए मिट्टी की बनी ऊंची-सी कोठी होती थी, जिसके तीन पाए होते थे, जिसमें कई बार एक टूटा होता था। वहां धान निकालने के लिए जो छेद होता था। उसमें कपड़े ठूंसे रहते थे। ताखे पर रखा छोटा-सा आईना होता था, जिसमें देखकर अक्सर बच्चे मांग निकालना सीखते थे या नयी बहुएं बिंदी ठीक माथे के बीच लगाना।
मैंने कभी चाची या दादी को आईना देखते नहीं देखा। वे बिना आईना देखे ठीक सीधी बीच मांग निकाल लेतीं, सिंदूर टीक लेतीं, बिंदी लगा लेतीं। शाम होते चूल्हा लगा दिया जाता। पूरे गांव में कहीं से गुज़रने पर धुएं की गंध आने लगती। कहीं लकड़ी तो कहीं कोयले पर खाना बनता। बोरे में कोयला रखा रहता और उसे तोड़ने के लिए एक हथौड़ा भी। खाने की दो तरह की अनाउंसमेंट होती। पहला हरकारा जाता कि पीढ़ा लग गया है। इसमें लकड़ी का पीढ़ा और पानी का गिलास भर के रख दिया जाता था। खाने वाले लोग कुएं पर हाथ-मुंह धोने चले जाते थे। फिर दूसरा हरकारा जाता था कि खाना लग गया है, मतलब कि थाली लग गयी है। तब लोग पीढ़े पर आकर बैठते थे और खाना खाते थे। गांव में अब पक्का मकान बन गया है। चाची अब नीचे बैठकर नहीं बना सकती तो एक चौकी पर गैस रखा है और वो कुर्सी या स्टूल पर बैठ कर खाना बनाती हैं। मैं गांव का मेला देखना चाहती हूं। इन अकेले दिनों में। किसी बचपन में लौट कर।
साभार : लहरें डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम
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