जटिल भू-भागों की सतर्क निगरानी जरूरी
हमने कारगिल की लड़ाई जीतकर दुनिया को बताया था कि भारतीय सेना अपने भू-भाग की रक्षा करने में सक्षम है। यह भी कि हम दूसरे के इलाके पर नजर नहीं रखते, मगर अपने भू-भाग को बचाने का हौसला रखते हैं। हालांकि, आज दो दशक बाद हम उसी तरह की चुनौती का सामना एलएसी पर कर रहे हैं, लेकिन कारगिल के अनुभव हमारे काम आये हैं। भारतीय सैनिकों ने चीनी अतिक्रमण का जिस तरह जवाब दिया और राजनीतिक नेतृत्व ने जैसी दृढ़ता दिखायी, उससे आज चीन बैकफुट पर है। इस घटनाक्रम के बाद चीन के साम्राज्यवादी मंसूबों के चलते उसके आर्थिक बहिष्कार का सिलसिला दुनिया में शुरू हो गया है। कारगिल युद्ध के बाद भी पाक दुनिया में अलग-थलग पड़ा। यहां तक कि उसने अपने संरक्षक अमेरिका का विश्वास हमेशा के लिए खोया। दरअसल, पाकिस्तान जनरलों ने 1984 में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सियाचिन की चोटियां गंवाने के बाद से कारगिल प्लान पर काम करना शुरू कर दिया था। मकसद यही था श्रीनगर-लेह आपूर्ति लाइन को तोड़कर सियाचिन पर कब्जा करना। महत्वाकांक्षी जनरल परवेज मुशर्रफ ने राजनीतिक नेतृत्व को विश्वास में लिये बगैर नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री के जवानों को कारगिल की ऊंची चोटियों पर पहुंचा दिया था। अभियान इतना गोपनीय था कि भारतीय खुफिया एजेंसियां भी गच्चा खा गईं। लेकिन भारतीय हवाई हमलों और बोफोर्स तोपों ने युद्ध की तस्वीर ही बदल दी।
निस्संदेह, कारगिल युद्ध में हमने बड़ी संख्या में जवानों को खोया और बड़ी तादाद में जवान जख्मी हुए, मगर इस लड़ाई ने सबक दे दिया कि हमारी सीमाएं विस्तृत हैं, इनकी सुरक्षा के लिए व्यापक रणनीति बनाने की जरूरत है। चीनी अतिक्रमण ने भी इसी तरह की चूक की ओर इशारा किया है। डोकलाम और अन्य अतिक्रमणों तथा एलएसी के पास पीएलए के निर्माण के बाद हमें इस खतरे को भांपना चाहिए था। फिर भी कारगिल युद्ध के दौरान मिले अनुभव-सीख और उसके बाद की सैन्य तैयारियों का लाभ दो दशक बाद गलवान विवाद के दौरान मिला। इसके बाद एलओसी और एलएसी सुरक्षा तैयारियां मजबूत की गई हैं। पाक-चीन सीमा पर सैनिकों की पर्याप्त संख्या में तैनाती हुई। सामरिक महत्व की ढांचागत परियोजनाओं को अंतिम रूप दिया गया। आज हम यदि गलवान में चीन का मुकाबला डटकर कर पाये तो इसके मूल में कारगिल से मिले सबक और अनुभव ही थे। सेना का ऊंचे और कम आक्सीजन वाले ठंडे इलाकों में युद्ध के लिये तैयार हो पाना कारगिल युद्ध की ही देन है। निस्संदेह, कारगिल युद्ध के दौरान हमारी खुफिया तंत्र की कमजोरी उजागर हुई थी। उसके बाद खुफिया तंत्र में सुधार हुआ। तब तीनों सेनाओं के बेहतर तालमेल की कमी सामने आई थी। उसके तुरंत बाद सीडीएस की नियुक्ति का सुझाव सामने आया तो दो दशक बाद उसे मूर्त रूप दिया गया। एलएसी पर सेना की शीघ्र तैनाती हेतु लद्दाख के लिए रोहतांग मार्ग का विकल्प तैयार किया गया। कारगिल में हमने कुछ खोकर गहरे अनुभव हासिल किये।
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