कमल किशोर गोयनका
प्रेमचंद भारतीय जनमानस की स्थितियों, इच्छाओं, विषमताओं और आकांक्षाओं के कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने युग जीवन का जितना सच्चा चित्रण किया है, उतना हिन्दी का अन्य कोई लेखक नहीं कर सका है। उनका साहित्य जनजीवन की विविध विषमताओं, विडम्बनाओं और समस्याओं के चित्रण से भरा पड़ा है। प्रेमचंद का दृढ़ विश्वास था कि समाज की समस्याओं तथा गरीबों एवं शोषकों की दुरावस्था को साहित्य के माध्यम से शिक्षित व्यक्तियों के सम्मुख रखना साहित्यकार का सर्वप्रथम कर्तव्य है।
उन्होंने अपने साहित्य में तीन प्रकार की समस्याओं का चित्रण किया है—परम्परागत जीवन एवं रूढ़ियां, अन्धविश्वासों से उत्पन्न समस्याएं, युग परिस्थितियों से उत्पन्न समस्याएं तथा इन परिस्थितियों और समस्याओं को देखते हुए भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्याएं। भारत की जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि एक ऐसी समस्या थी जो प्रेमचंद के काल में सामने आ चुकी थी और चिन्तकों ने इस पर गम्भीरता से विचार करना आरम्भ कर दिया था। प्रेमचंद ने स्वयं इस समस्या पर अनेक कोणों से विचार किया और अनेक सम्पादकीय टिप्पणियों एवं कहानियों आदि में इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट किए। प्रेमचंद ने सीमित परिवार के औचित्य का उल्लेख करते हुये ‘हंस’ मई, 1934 में लिखा, ‘उस युग (प्राचीन भारत) में आबादी की जरूरत थी और रोटी का प्रश्न इतना जटिल न था। अब जमाना बदल रहा है और संसार में जरूरत से ज्यादा आदमी हो गए है।
इसके साथ ही बच्चों के पालन-पोषण का भार भी बढ़ गया है। हम अपने बालकों को पुष्टिकारक भोजन और अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं और बहुत से बच्चों का बोझ सिर पर लाद कर अपनी जिन्दगी नहीं तल्ख करना चाहते। साधारण वित्त के आदमी को अगर सात-आठ लड़कों-लड़कियों का खर्च उठाना पड़े, तो समझ लो कि उसकी और उसके बच्चों की शामत है। इसी जरूरत ने ‘सन्तान निग्रह’ के विचार को जन्म दिया।’ प्रेमचंद ने इससे दस वर्ष पूर्व लिखे अपने उपन्यास ‘रंगभूमि’ में भी एक पात्र से कहलाया है, ‘हमारी जननी संतान-वृद्धि के भार को अब नहीं संभाल सकती। विद्यालयों में, सड़कों पर, गलियों में इतने बालक दिखाई देते हैं कि समझ में नहीं आता, ये क्या करेंगे? हमारे देश में इतनी उपज भी नहीं होती कि सब के लिए एक बार इच्छापूर्ण भोजन भी प्राप्त हों।’ इन दोनों ही उद्धरणों से स्पष्ट है कि प्रेमचंद ने भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ में सीमित जनसंख्या और सीमित परिवार को अत्यावश्यक माना था। उनके विचार आज से लगभग 40 से 100 वर्ष पुराने हैं, लेकिन सीमित जनसंख्या के सम्बन्ध में उनके विचार एवं तर्क पूर्णत: आधुनिक हैं। प्रेमचंद ने जनसंख्या को सीमित करने की आवश्यकता उसी समय समझ ली जब देश की जनसंख्या 30-35 करोड़ थी।
प्रेमचंद मानव समाज में स्त्री की दयनीय दशा से परिचित थे। प्रकृति ने स्त्री को ही संतानोत्पत्ति का दायित्व सौंपा है। प्रेमचंद की कहानी ‘कानूनी कुमार’ का नायक इस इस स्थिति के सम्बन्ध में कहता है—इस समाज, इस देश और इस जीवन का सत्यानाश हो, जहां रमणियों को केवल बच्चा जनने की मशीन समझा जाता है। इस बेचारी को जीवन का क्या सुख? कितनी ही ऐसी बहनें इसी जंजाल में फंस कर 30-35 वर्ष की अवस्था में, जबकि वास्तव में जीवन को सुखी होना चाहिए, रुग्ण होकर संसार-यात्रा समाप्त कर देती हैं। हां भारत! यह विपत्ति तेरे सिर से कब टलेगी? नर-हत्या का जो दण्ड है, वही दण्ड ऐसे मनुष्यों को मिलना चाहिए। मुबारक होगा वह दिन जब भारत में इस नाशिन प्रथा का अन्त हो जाएगा—स्त्री का मरण, बच्चों का मरण, और जिस समाज का जीवन ऐसी सन्तानों पर आधारित हो, उसका मरण।
…बेकारी का यह हाल कि आधी जनसंख्या मक्खियां मार रही है, आमदनी का यह हाल है कि भरपेट किसी को रोटियां नहीं मिलतीं, बच्चों को दूध स्वप्न में भी नहीं मिलता और ये अन्धे हैं कि बच्चे पर बच्चे पैदा करते जाते हैं। ‘संतान-निग्रह बिल’ की जितनी जरूरत इस देश को है, उतनी और किसी कानून की नहीं।’ इस लम्बे संवाद में पुरुष की विलासिता की घोर निंदा की गई है और स्त्री को बच्चे पैदा करने के लिए दण्ड की व्यवस्था की गई है। वास्तव में, सन्तानोत्पत्ति में स्त्री ही सारे भार और दण्ड को उठाती है। प्रेमचंद ने ‘हंस’, नवम्बर, 1932 के अंक में ‘महिला सभाओं’ में संतान-निग्रह के प्रस्ताव के शीर्षक से अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में महिलाओं द्वारा संतान-निग्रह का प्रस्ताव लाने का इसलिए समर्थन किया क्योंकि संतानोत्पत्ति की दुस्सह वेदना और पालन-पोषण स्त्री को ही करना पड़ता है। सैकेंडरी अध्यापक सम्मेलन, महिला-सम्मेलन, कराची और पंजाब में इस प्रकार के प्रस्ताव पहले ही स्वीकृत हो चुके थे।
परिवार नियोजन के साधन : प्रेमचंद ने परिवार नियोजन के लिए दो प्रकार के साधनों की चर्चा की है—एक, स्वाभाविक साधन, दूसरा, कृत्रिम साधन। प्रेमचंद संतान-निग्रह का सम्बन्ध कृत्रिम साधनों से जोड़ते हुए नवम्बर, 1932 के अंक में लिखते हैं, संतान-निग्रह का अर्थ है, कृत्रिम साधनों से संतान की उन्नति को रोकना। इसके स्वाभाविक साधन भी हैं, पर यह शब्द उस अर्थ में प्रयुक्त नहीं किया जाता। प्रेमचंद ने स्वाभाविक साधन को सर्वाधिक महत्व दिया है, परंतु दूसरे कृत्रिम साधन का भी स्वागत किया। उनके अनुसार स्वाभाविक साधन में ब्रह्मचर्य और संयम आते हैं। ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में प्रेमचंद ने ‘हंस’ मई, 1934 के अंक में लिखा—ब्रह्मचर्य के महत्व को हिन्दू शास्त्रकारों ने जितना समझा था, उतना शायद और कहीं न समझा गया हो, लेकिन इसका उद्देश्य संतान-निग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के बल-बुद्धि की रक्षा करना था। उत्तम संतान के लिए बल-बुद्धि की रक्षा आवश्यक थी।
यद्यपि प्रेमचंद ने गांधी जी के समान ब्रह्मचर्य और संयम को प्राथमिकता दी, लेकिन कृत्रिम साधनों से संतानोत्पत्ति रोकने का भी स्वागत किया। उन्होंने ‘हंस’ मई, 1934 में ‘संतान-निग्रह और प्राकृतिक नियम’ शीर्षक से संपादकीय टिप्पणी में लिखा, ‘इसमें तो किसी को आपत्ति नहीं है कि संतान-निग्रह (परिवार नियाेजन) आवश्यक वस्तु है। मतभेद इसी में है कि वह उद्देश्य ब्रह्मचर्य द्वारा पूरा किया जाये या कृत्रिम उपायों से। अगर ब्रह्मचर्य हो सके तो सबसे उत्तम, लेकिन वह न हो सके तो हम कृत्रिम साधनों को भी बुरा नहीं समझते। कुछ विद्वानों का कथन है कि हमें प्राकृतिक विधान में बाधक न होना चाहिए, क्योंकि इसका परिणाम भीषण होता है। मगर मानव संस्कृति तो प्राकृतिक विधान के विरोध का ही नाम है। अगर हम प्राकृतिक मार्ग पर ही चलते तो आज भी कंदराओं में रहते और शिकार पर जिंदगी बसर करते। प्रकृति पर विजय पाना तो मानवीय सभ्यता का लक्ष्य ही है। लेकिन उन्हें भय है कि कृत्रिम साधनों के उपयोग करने से भारतवासी भोग-लालसा में लिप्त न हो जाएं। इसी आशंका को ‘हंस’ नवम्बर, 1932 के अंक में उन्होंने लिखा, ‘अगर इस निग्रह का फल यह होता है कि हम अवैध रूप से विषय-भोग में पड़ जाएं तो यह समाज के लिए आशीर्वाद की जगह शाप सिद्ध होगा।’ इसका अर्थ है कि कृत्रिम साधनों से यदि संतानोत्पत्ति और भोग-लालसा को नियंत्रित किया जा सकता है तो प्रेमचंद की दृष्टि से वह समाज के लिए आशीर्वाद बन सकता है।
संतानोत्पत्ति का सीमित अधिकार : प्रेमचंद जनसंख्या को सीमित रखने के साथ संतानोत्पत्ति के सीमित अधिकार की भी चर्चा करते हैं। उन्होंने ‘हंस’ नवम्बर, 1933 के अंक में अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा, ‘अभी हाल ही में प्रयाग में प्रान्तीय महिला सम्मेलन हुआ, उसमें और कई महत्व के प्रस्तावों के साथ सन्तान-निग्रह का प्रस्ताव भी स्वीकृत हुआ और म्युनिसिपॅलिटियों और सरकारों से इसकी विधि सिखाने का प्रबन्ध करने का आदेश किया गया। युजिनेक शास्त्र यह कहता है कि देश में अयोग्य स्त्री-पुरुषों को न्युटरलाइज कर देना चाहिए, अर्थात उन्हें जनन-शक्ति से वंचित कर देना चाहिए और देश में संतान उत्पन्न करने का अधिकार ऐसे प्राणियों को मिलना चाहिए जो दिल, दिमाग और देह तीनों से मजबूत हों और इसके साथ ही खुशहाल भी हों। अतएव देश में जो विद्वान, प्रतिभाशाली, तेजस्वी स्त्री-पुरुष हैं, उन्हीं पर देश में योग्य संतान पैदा करने की जिम्मेदारी आती है। अतएव इस सम्मेलन की विदुषी, मनस्वी, स्वाभिमानी देवियों को जहां यह प्रचार करने की जरूरत है कि अयोग्य स्त्री-पुरुष संतान उत्पन्न न करें, वहां अपनी योग्य बहनों को सुयोग्य संतान उत्पन्न करने की प्रेरणा करनी चाहिए।’
प्रेमचंद की कहानी ‘कानूनी कुमार’ का नायक कानूनी कुमार भी एक स्थान पर कहता है ‘जिसकी आमदनी सौ रुपये से कम हो, उसे संतानोत्पत्ति का अधिकार ही न हो।’ प्रेमचंद के इन विचारों से सभी का सहमत होना सम्भव नहीं है, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि वे जनसंख्या को सीमित रखने के साथ उसे अधिक से अधिक सुयोग्य, शिक्षित एवं सम्पन्न बनाने के लिए भी समान रूप से चिंतित हैं। प्रजातंत्र में किसी भी नागरिक को संतानोत्पत्ति के अधिकार से वंचित करना सम्भव नहीं है, लेकिन गरीब और अशिक्षित जनता को असीमित संतानोत्पत्ति का अधिकार होने पर देश का समुचित विकास नहीं हो सकता। प्रेमचंद के इन विचारों में कुछ अतिवादी भावना दृष्टिगत होती है, लेकिन इनसे यह तो समझा ही जा सकता है कि वे भारत की जनसंख्या को सीमित, सुयोग्य, शिक्षित एवं सम्पन्न देना चाहते थे। साथ ही, उन्होंने संतानोत्पत्ति को रोकने के लिए ‘नसबन्दी’ का निस्संकोच समर्थन करके सभी अंधविश्वासों को ठुकरा दिया है।
हम दो, हमारे दो : प्रेमचंद ने इस सीमित परिवार के संबंध में सन् 1929 में सोचना आरंभ कर दिया था। उनकी ‘कानूनी कुमार’ कहानी ‘माधुरी’ अगस्त, 1929 में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी का नायक कहता है, ‘दो बच्चों से ज्यादा जिसके हों, उसे कम से कम पांच वर्ष की कैद, उसमें पांच महीने से कम कालकोठरी न हो।’ प्रेमचंद ने ‘हम दो, हमारे दो’ के सीमित- परिवार पर एक मार्मिक कहानी ‘गमी’ लिखी जो ‘मतवाला’ (कलकत्ता) 13 अगस्त, 1929 के अंक में प्रकाशित हुई थी। हिन्दी संसार अभी तक इस कहानी से अपरिचित था, क्योंकि ‘मतवाला’ में प्रकाशित होने के पश्चात यह कहानी किसी संकलन में सम्मिलित नहीं की गई और काल के प्रवाह में खो गई। ‘प्रेमचंद साहित्य कोश’ बृहद् योजना पर कार्य करते हुए मुझे यह कहानी प्राप्त हुई। इस कहानी का नायक बाबू भागीरथ प्रसाद तीसरे बच्चे के जन्म को आनन्द का विषय न मानकर ‘गमी’ (मौत) समझता है। पत्नी के तीसरी संतान उत्पन्न होने पर वह सारे मोहल्ले में कहला देता है कि उसके घर में गमी हो गई है। उसके मित्र शवयात्रा में सम्मिलित होने उसके घर पहुंचते हैं तो लाश, कफन, रोना-पीटना न देखकर आश्चर्यचकित होते हैं। भागीरथ प्रसाद ‘गमी’ के रहस्य को खोलते हुए कहता है ‘वही जो सबसे प्यारा, मेरा मित्र, मेरे जीवन का आधार, मेरा सर्वस्व, बेटे से भी प्यारा, स्त्री से भी निकट, मेरे ‘आनन्द’ की मृत्यु हो गई। एक बालक का जन्म हुआ, मैं इसे आनन्द का विषय नहीं, शोक की बात समझता हूं। आप लोग जानते हैं कि मेरे दो बालक मौजूद हैं। उन्हीं का पालन में अच्छी तरह नहीं कर सकता। दूध भी कभी नहीं पिला सकता, फिर इस तीसरे बालक के जन्म पर में आनन्द कैसे मनाऊं। इसने मेरे सुख और शांति में बड़ी भारी बाधा डाल दी। मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि इसके लिए दाई रख सकूं। मां इनको खिलाये, इनका पालन करे या घर के दूसरे काम करे। फर्ज यह होगा कि मुझे सब काम छोड़ कर इसकी सुश्रूषा करनी पड़ेगी। दस-पांच मिनट जो मनोरंजन या सैर में जाते थे, अब इसी सत्यकार की भेंट होंगे। मैं इसे विपत्ति समझता हूं और इसीलिए इस जन्म को गमी कहता हूं।’ नायक गंगा-जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करने को तैयार है कि वह अब ऐसी महान मूर्खता नहीं करेगा।
प्रेमचंद के ये विचार केवल कहानियों तक ही सीमित नहीं हैं। जैनेन्द्र कुमार ने 4 सितम्बर, 1930 को स्पेशल जेल, गुजरात (पंजाब) से प्रेमचंद को पत्र लिखते हुए पुत्र के उत्पन्न होने की सूचना दी। प्रेमचंद ने 17 दिसम्बर, 1930 को जैनेन्द्र कुमार को उत्तर देते हुए अपने पत्र में लिखा ‘पुत्र मुबारक! ईश्वर चिरायु करे। या यो कहूं, चिरायु हो। मैं तो पुराने ख्याल का आदमी हूं। दो पुत्रों तक तो बधाई दूंगा, इसके बाद जरा सोचूंगा।’ प्रेमचंद के इन विचारों से स्पष्ट है कि उन्होंने ‘हम दो, हमारे दो’ के आदर्श को 46-47 वर्ष पहले ही अपना लिया था और अपने विचारों को निस्संकोच ‘कानूनी कुमार’ और ‘गमी’ कहानियों में व्यक्त किया। यह उनकी प्रगतिशीलता, भविष्य-द्रष्टा होने का प्रमाण है। उनके उपन्यासों में भी, जिनमें परिवारों की कथा है, दो-तीन से अधिक संतानें नहीं हैं। ‘रंगभूमि’ में जान सेवक और राजा महेन्द्र के दो-दो संतानें हैं और ‘कायाकल्प’ में चक्रधर तथा ‘गबन’ में रमानाथ अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है। ‘गोदान’ में होरी के अवश्य ही तीन संतानें हैं। प्रेमचंद की स्वयं तीन संतानें (दो पुत्र, एक पुत्री) है। इस प्रकार प्रेमचंद सदैव एक छोटे परिवार के समर्थक रहे और, इसे उन्होंने अपने जीवन और साहित्य में सफलतापूर्वक निभाकर दिखाया। ‘कानूनी कुमार’ का नायक कहता है कि एक सन्तान के बाद कम से कम सात वर्ष तक दूसरी संतान न आने पाए।
प्रेमचंद के उपरोक्त विचारों से परिचित होने पर सुखद आश्चर्य होता है कि परिवार-नियोजन द्वारा जनसंख्या को सीमित रखने की आधुनिक समस्या को उन्होंने कितनी गम्भीरता से लिया था और कितनी गहराई से समझा था। उनके इन विचारों से स्पष्ट है कि वे दशकों पहले ही जनसंख्या की व्यापक समस्या से अवगत हो चुके थे। आज के परिवार-नियोजन कार्यक्रम के मूल में भी आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनाएं प्रेरणा-भूमि रही है। प्रेमचंद के इन विचारों से स्पष्ट है कि उन्होंने जिस विकासशील एवं स्वस्थ भारत का स्वप्न देखा था, और जिस भारत की जनता को स्वराज्य दिलाने की लेखकीय साधना में वे लगे रहे, वह केवल स्वस्थ, योग्य एवं सीमित जनसंख्या से ही सम्भव है। प्रेमचंद के सभी विचारों से आज सहमत होना सम्भव नहीं है, लेकिन निस्संकोच कहा जा सकता है कि वे भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले अविकसित देश की जनसंख्या को सीमित एवं नियंत्रित रखने के पक्ष में थे।
हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनके ये विचार उस समय के हैं, जब भारत की जनसंख्या 30 करोड़ के लगभग थी। अब जनसंख्या 130 करोड़ के ऊपर हो गई है। आज की स्थिति में प्रेमचंद के विचार क्या होते, इसे सहज में ही समझा जा सकता है। उन्होंने जनसंख्या को सीमित करने के लिए ‘संतान-निग्रह बिल’ का समर्थन नहीं किया, बल्कि जनचेतना को जाग्रत करने पर बल दिया।
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